Wednesday, 22 February 2012

            रेत का जीवन


समुन्द्र के किनारे पड़ी रेत के देखो
तो पता चले
उसके पास कितना दुःख छुपा है
पर फिर भी शांत पड़ी है...
न कोई दोस्त है उसका
न कोई दुश्मन
न किसी सुख की चाह
बस जीवन जी रही है...
 समुन्द्र जब चाहता है
उठाकर ले जाता है
समुन्द्र जब चाहता है
छोड़ जाता है
 फिर भी कुछ नहीं कहती है
न ही कभी रोंती है ...
पर उसके तन में नमी है
जब इस नमी को सूरज सुखा देता है तो
उड़ने लगती है
हवा के साथ खेलकर मन बहला लेती है...
फिर वही अधीर हो गिर जाती है
लहरों  के साथ फिर चल देती है
जब कभी उसे कोई हाथ में लेता हे तो
भाग्यवान समझकर उसका स्पर्श करती है
जब कभी उसे कोई रौंदता हे तो
भाग्यहीन समझकर रो लेती है
पर आंसुओ को बहार आने नहीं देती है
अन्दर छुपाकर उन्हें घोट जाती है

यही हे जीवन रेत  का ...
पर फिर भी कभी समुन्द्र का साथ नहीं छोडती
जब तक समुन्द्र नहीं मरता
अपने आप को मरने नहीं देती... 

 



 

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