Thursday, 17 November 2011

   स्कूल और बचपन

शब्दों में  जब उस
बचपन को उतारना चाहा
तो हर कोशिश नाकाम सी लगी
उस मासूम बचपन के लिए
कविता लिखनी कुछ बेनाम सी लगी
फिर शब्दों को तोड़ मरोड़  के
आखरीन  कुछ शुरू हो ही गया
क्लास के उस दरवाजे पे
किसी की दस्तक  का
इन आँखों के पीछे दीदार हो ही गया
फिर खेल का वो मैदान  याद  आया
जिससे हर दोपहरी रोशन होती थी
वो कैंटीन के समोसे भी याद  आये
हर दोस्त की नज़र जिसपर होती थी
वो रातो को अगले दिन की उधेड़बुन  मे
आधी रात निकल जाया करती थी
पर सवेरे साडे सात  पर हाजरी
बड़ी पाबंध हुआ करती थी


हस्ते हस्ते केसे  ये बचपन बीत गया
ये खबर अब जाके आई है
एक मुस्कुराह भी जब हमने 
एक मुदत्त बाद  पाई है...     

           सच्चाई

जिंदगी के इस सफ़र में 
कई गलतफेमिया सी रही है मुझको
जादा ऐतबार करने की
आदत सी रही है मुझको

साबित करता है मेरा रुदन 
मै अकेली ही हू
अपनों से बहुत दूर
तनहा चल रही हू

यु तो हर महफ़िल मुझ बिगर
अधूरी सी है
फिर भी न जाने क्यों 
हर नज़र थोड़ी खफा सी है

ये तो सच है की
कोई किसी की तन्हाई दूर किया नहीं करता
पर ये भी झूट नहीं के 
कोई सच में साथ दिया नहीं करता...