स्कूल और बचपन
शब्दों में जब उस
बचपन को उतारना चाहा
तो हर कोशिश नाकाम सी लगी
उस मासूम बचपन के लिए
कविता लिखनी कुछ बेनाम सी लगी
फिर शब्दों को तोड़ मरोड़ के
आखरीन कुछ शुरू हो ही गया
क्लास के उस दरवाजे पे
किसी की दस्तक का
इन आँखों के पीछे दीदार हो ही गया
फिर खेल का वो मैदान याद आया
जिससे हर दोपहरी रोशन होती थी
वो कैंटीन के समोसे भी याद आये
हर दोस्त की नज़र जिसपर होती थी
वो रातो को अगले दिन की उधेड़बुन मे
आधी रात निकल जाया करती थी
पर सवेरे साडे सात पर हाजरी
बड़ी पाबंध हुआ करती थी
हस्ते हस्ते केसे ये बचपन बीत गया
ये खबर अब जाके आई है
एक मुस्कुराह भी जब हमने
एक मुदत्त बाद पाई है...