इंसानियत की पूर्णता
आज बड़ा चिंतन कर
एक राह पर चली तो हूँ
पर इस सोच में पड़ी हूँ
के क्या हासिल कर सकी हूं
वह राह बड़ी धुंदली सी है
कुछ पकड़ने से पहले ही
सब चीज़ निकल पड़ी है
चलो बता ही दूँ के
क्या खोजने चली हूँ
मैं इस कलयुग में
इंसानियत ढूंढ़ने चली हु !!
पता है कुछ हाथ न लगेगा
पर फिर भी चल रही हूँ
इधर नज़र घुमाई तो मक्कारी नज़र आयी
उधर नज़र घुमाई तो डकैती
फिर सोचा, किसी मंदिर मे चलू
शायद कुछ शांति मिल जाये
पर यहाँ भी निराशा ही हाथ लग पायी
ईश्वर कुछ नाराज़ से नज़र आये
मन्न मे कुछ सोचते से नज़र आये
वह सोचते होंगे , मे क्यों इनका भला करू
जब ये किसी का नहीं करते
किसी भूखे को एक रोटी भी दान नहीं करते
फिर थोड़ी दूर और चली
एक बूढ़ी माँ नज़र आयी
मेने पूछा क्या बात है माँ जी !!
वह कुछ रोती सी नज़र आयी
आज बेटे ने माँ को मारा था
और यही कारण है एक माँ का विश्वास टूटा था
इतना देखने के बाद आगे चलने की
हिम्मत न जुटा पायी और फिर'
दिमाग मे वापिस लौटने की बात आयी
पर फिर न जाने किसनें मुझ से कुछ पूछा
के क्या ढूंढ़ने चली थी इंसानियत ?!
सहमी सी मैं कुछ न कह पायी
शायद उन्होंने मेरा चेहरा पढ़ा
और मुझसे से कहा
के तू बिलकुल वर्थ है
तेरा कोई अस्तित्व नहीं !
मे बर्फ के समान जम गयी
इस कदर ज़मी
के रोने का दिल किआ पर एक भी आंसू
बाहर न आयी
सब सुन्न सा हो गया था
सब ठहर सा गया था
यह ठहराव बस मेरे लिए था आज ये दिल चकनाचूर हो गया था'
फिर से उन्होंने कुछ कहा था शायद
पर कुछ सुनाई नहीं दे रहा था
फिर एक तूफ़ान सा आया
जिसने मुझे जगाया
फिर उन्होंने मुझ से पूछा
के क्या तू कुछ कर नहीं सकती???
क्या इस निर्ममता को कुछ कम् नहीं कर सकती
अगर नहीं तो तू बेकार है
उस दिन से आज तक मेरा मन्न इस सोच मे हैं
के ये जीवन और ये काया वर्थ है
उस दिन मुझे पूर्णता प्राप्त होगी
जिस दिन मे कुछ कर सकुंगी
और अगर इस राह पर चलते चलते
मेरे कदम डगमगाएँगे तो
हे ईश्वर! आपसे एक ही विनती हे
मुझे केवल नर्क की ही प्राप्ति हो
और इस वर्थ काया की समाप्ति हो।।
वेदना सी भरी पर कुछ ठोस जोड़ने को तैयार मैं शालिनी !
धन्यवाद!